Religious Development for Sanatan Culture

विज्ञान हमारे जीवन को कितना प्रभावित करती है

by Sudhanshu
Created Jan 06, 2024 | Head Office:Madarihat Alipurduar West Bengal
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विज्ञान से हमारे जीवन में कितना सफल और कितना असफल है


परिचय सनातन प्रहरी सनातन धर्म का एक रक्षक एवं प्रचारक :

विश्व सनातन धर्मावलंबी बंधुओं को सुधांशु का स्प्रेम प्रणाम मेरी उम्र लगभग ६२ वर्ष की है प्रकृति की अनुकम्पा से अभी तक मैं स्वस्थ हूं ।मैं भारत के पश्चिम बंगाल प्रान्त के सुभास नगर प्रखण्ड:मादारिहाट, जिला: अलीपुरद्वार के पश्चिम बंगाल में स्थाई रूप से निवास करता हूं , विगत कई वर्षों से सनातन विरोधियों के विरूद्ध आवाज उठाता आया हूं , जो ये क्रम मृत्यु तक जारी रहेगा ।

आज इस मुकाम पर आकर मुझे ईश्वर के विशेष निर्देश अनुरूप ब्रह्मांडीय शक्तियों के माध्यम से कार्य करने के लिए निरंतन निर्विघ्न निर्देश आते रहते हैं, जो मुझे विशेष सौभाग्य प्राप्त हुआ है और मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मानता हूं ।मैं ब्रह्मांडीय शक्तियों के निर्देशाअनुसार कार्य करता रहता हूं, जिसे आप लॉ ऑफ अट्रैक्शन भी कह सकते हैं या कर्मा सिद्धान्त का प्रतिपादित होना भी कह सकते हैं

यह ईश्वरीय कार्य हमारे पूर्वार्ध के कर्मो को स्मरण कराता है एवं अगले जन्म की तैयारी के लिए विशेष कर्म को भी निर्धारण करने में हमारी संस्कार संस्कृति को बल प्रदान करता है ।

जो सहोदर भाई इस कर्म से अनभिज्ञ हैं वो भाई हमारे इस कार्य में सहभागी बन सकते हैं । सत्य सनातन संस्कृति को आप के आर्थिक सहयोग के साथ विस्तार करने की आवश्कता है।

मैं आशा करता हूं की आप अपने इस कार्य में सक्रिय भागीदारी के रूप में निभाने के लिए समर्पित होना चाहेगें ।मैं सनातन संस्कृति के प्रति जागरूक, समर्पित एवं संरक्षक की भूमिका निभा रहा हूं मुझे आप से ढेर सारी उम्मीद की आशा करता हूं। क्यू कि हमारे सत्य आचरण कर्म हीं पूर्वार्द्ध एवं अगले जन्म का मार्ग प्रशस्त करता है।
​​​​​प्रणाम

विज्ञान ने मानव जीवन के संबेदनाओं को समाप्त कर दिया है ।
आज मनुष्य जो सबसे ज्यादा विज्ञान के समीप है , वह सबसे ज्यादा कुंठित एवं अंतर्मुखी हो गया है ,आज इनके पास विज्ञान का प्रदर्शन के अलावा कुछ भी नही है, आज विज्ञान मनुष्य से मानवता को छीन लिया समाप्त कर दिया है।

आज आप संयुक्त परिवार में रहते हुए भी आप अपने परिवार में एक दुसरे से चाह कर भी बात चीत नही कर पा रहे हैं । क्यू की उनके पास विज्ञान का दिया हुआ एक साथी है जो हमेशा उनके साथ रहता है।
​​ये साथी आप को आस्था प्रेम राग अनुराग संवेदना से आप को दूर रखता है । आप को सब से अलग रखता जो एक खतरनाक नशा है ।

पहले मां बाप अपने बच्चों को बुढ़ापा का अपना सहरा समझते थें लेकिन आज औलाद होते हुए भी वे एक एकांत जीवन यापन करने के लिए मजबूर हैं आखिर क्यू ?। क्या कारण है ? की आज हमारी जिन्दगी अनजान चौराहे पर ठहर गई है , आज सभी अभिभावक में भ्रम की स्थित बनी हुई है सभी अभिभावक सदमें में हैं। उनके अपनी बुढ़ापा की लाठी कहीं गुम हो गई है। एक अनजाने भय के साए में जीवन गुजर रहे हैं। हमारे संस्कार संस्कृति की घर वापसी क्यू नही हो पा रही है ? । आज जो बच्चे मां बाप को छोड़ कर जहां चले गए उसकी मान्यता मां बाप के समक्ष समाप्त हो गई लगती है । उसकी घर वापसी की कोई उम्मीद नहीं रह जाती है। क्या कारण है ?, क्या इसके लिए हमारे लालन पालन में कमी रह गई थी , या हम अपने सनातन संस्कृति को कहीं ना कहीं भूल गए हैं ? या हम अपने जीवन में उस संस्कार संस्कृति को अनदेखा किया है, या उसकी हम उपेक्षा किए हैं ?। गलती तो कहीं ना कहीं हुई है, हमें सोचना चाहिए।

हम अपने आप को अधिक सभ्य उत्कृष्ट दिखाने के लिय अपने संस्कार को ही तोड़ दिए हैं, या हम संस्कार की लक्ष्मण रेखा तो कही नही लांघ गए हैं ???

वो समय नजदीक है जब एक अभिभावक की भूमिका ,एक चौकीदार की भुमिका तक सीमित रह जायेगी। हम केवल अपने को खुश रखने की केवल कोशिश करते हैं , लेकिन वास्तव में अंदर हीं अंदर हम दुखी रहते हैं। ये परम्परा आगे भी चलती रहेगी , यदि हम अपने संस्कार को पूर्वलोकन नही करते हैं तो । वास्तव में आप का सब लूट चूका है आप निराशा की घनघोर जंगल में जी रहे हैं।

​​​विज्ञान का दिया हुआ आज सब है,आज उसी के कारण हम टाइम ट्रैवल भी कर रहे हैं लेकिन सब के बावजूद आज अकेले हैं। विज्ञान हमें उन सभी सिद्धांतों को प्रतिपादित करेगा जिसकी हम आशा करते हैं।

लेकिन संवेदना व्यक्त करने की कला , प्रेम में आस्था का समागम करना , रूठें को मनाने की कला ,रिश्ते में एक दूसरे के प्रति जागरूकता, विश्वास करने की कला विज्ञान नही सीखा पाएगा। क्यू की सनातन संस्कृति हीं एक येसी परम्पर है जो विज्ञान के सभी कलाओं का समावेश कर रखा है। इसी लिए सनातन धर्म को प्रकृति का धर्म या संस्कृति कहा गया है।

हम उपरोक्त सिद्धान्त को प्रतिपादित करते हैं। हमारी जीवन यात्रा आज भी अपूर्ण है।क्यू की हमारे संस्कार संस्कृति की पूर्णता हमारे सनातन धर्म में हीं हो सकती है।

हमारे जीवन के १६ कलाओं का रसास्वादन सनातन धर्म हीं करा सकती है। तब जाकर हमारा मानव सभ्यता का जीवन अपने मनुष्य योनि को पूर्ण करता हुआ। अगले अपूर्ण कार्य को पूर्ण करने के लिए दुबारा जन्म लेने की तैयारी में जुट सकता है।

हमें प्रकृति की संस्कृति यानी सनातन धर्म को मानव जीवन के उत्थान एवं प्रकृति के रहस्यों को उसके संवेदनाओं को पुनः समझने की आवश्कता है । हमारी सनातन संस्कृति के प्रति लापरवाही हमारे नस्ल को विकृत कर रही है।
उसे सुधारने की नितान्त आवश्यक है।

आज सभी अभिभावक सनातन धर्मावलंबी सहोदर भाई से विनम्र निवेदन करूंगा की सनातन प्रहरी का समर्थन करें , आर्थिक सहयोग देकर समाज के सभी आयामों को पूर्ण करें।

आज आधुनिकता के आगोश में यूरोपियन देश उसका खमियाजा भुगत रहा है , वे भी हमारे सहोदर हैं उनको भी मेरी आवश्कता है।

सनातन संस्कृति का " वसुधैव कुटुंबकम " का मूल मंत्र हीं हमारी धारोहर है, जो विश्व कल्याण के लिए समर्पित हैं ।

सब कुछ रहते हुए आज विज्ञान का दिया हुआ संसारिक जीवन फैशन के अग्नि में अवसाद रूपी मनुष्य अपने आप को जल रहा है।

मनुष्य का मन अशांत रहता है वह अपने सिमाविहीन इच्छाओं की पूर्ति नही कर पा रहा हैं , जो की विज्ञान की असफलता है , इस से हमारा जीवन कुंठित हो रहा है।

मानव सभ्यता के लिए विज्ञान की प्रगति मानवीय दृष्टिकोण से एक प्रकार से खतरनाक साबित हो रहा है।जिसके कारण आत्म हत्याओं का प्रचलन बढ़ रहा है|

जो एक अपूरणीय क्षति है जो कभी पूर्ण नही हो सकता है । इसे विज्ञान की विफलता हीं कहेंगे।

आप भी अपने विचारों से सनातन प्रहरी को अवगत करा सकते हैं। आप का स्वागत है आप के विचारों से सनातन प्रहरी के मंच को शक्ति मिलेगी ।

आप के सुझाव को सम्मान मिलेगा आप हमारे सहोदर हैं । आप सनातन प्रहरी के प्रचारक बनें आप के समर्थन एवं आर्थिक सहयोग की हमें नितान्त आवश्यकता है।

प्रणाम
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